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चंद्र आरती

चंद्र आरती जयदेव जयदेव जय चिन्मय चंद्रा ॥ निजतेजें ओवाळूं सच्चित्सुखभद्रा ॥ध्रु०॥ उदयास्तुविणें शोभसि अखंड चिद्नगनीं ॥ भक्तचकोरां जिवविशि परमामृतपानीं ॥ अक्षय निजनिष्कलंक निरसुनि तमरजनीं ॥ तापत्रय दुर करिसी लावुनि निजभजनीं ॥१॥ तव करुणारसपियुषें जन वन वनस्पती ॥ स्थिरचर सफलित

जय जय श्री शनिदेवा

॥ आरती शनैश्चराची ॥ जय जय श्रीशनिदेवा ॥ पद्मकर शिरीं ठेवा ॥ आरती ओवाळीतों ॥ मनोभावें करूनी सेवा ॥ ध्रु०॥ सूर्यसूता शनिमूर्ती ॥ तुझी अगाध कीर्ती ॥ एकमुखें काय वर्णूं ॥ शेषा न चले स्फूर्ती ॥ जय जय ॥ १

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