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ज्ञानेश्वरी अध्याय १

||ज्ञानेश्वरी भावार्थदीपिका अध्याय १ || ||ॐ श्री परमात्मने नमः || अध्याय पहिला | अर्जुनविषादयोगः | ॐ नमो जी आद्या| वेद प्रतिपाद्या| जय जय स्वसंवेद्या| आत्मरूपा ||१|| देवा तूंचि गणेशु| सकलार्थमतिप्रकाशु| म्हणे निवृत्तिदासु| अवधारिजो जी ||२|| हें शब्दब्रह्म अशेष| तेचि मूर्ति

ज्ञानेश्वरी अध्याय २

||ज्ञानेश्वरी भावार्थदीपिका अध्याय २ || ||ॐ श्री परमात्मने नमः || अध्याय दुसरा | साङ्ख्ययोगः | संजय उवाच | तं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् | विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः ||१|| मग संजयो म्हणे रायातें| आईके तो पार्थु तेथें| शोकाकुल रुदनातें| करितु असे ||१|| तें

ज्ञानेश्वरी अध्याय ३

||ज्ञानेश्वरी भावार्थदीपिका अध्याय ३ || ||ॐ श्री परमात्मने नमः || अध्याय तिसरा | कर्मयोगः | ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन | तत् किं कर्मणि घोरे माम् नियोजयसि केशव ||१|| मग आइका अर्जुनें म्हणितलें| देवा तुम्ही जें वाक्य बोलिलें| तें निकें म्यां

ज्ञानेश्वरी अध्याय ४

||ज्ञानेश्वरी भावार्थदीपिका अध्याय ४ || ||ॐ श्री परमात्मने नमः || अध्याय चवथा | ज्ञानकर्मसंन्यासयोगः | आजि श्रवणेंद्रियां पाहलें| जें येणें गीतानिधान देखिलें| आतां स्वप्नचि हें तुकलें| साचासरिसें ||१|| आधींचि विवेकाची गोठी| वरी प्रतिपादी श्रीकृष्ण जगजेठी| आणि भक्तराजु किरीटी| परिसत असे

ज्ञानेश्वरी अध्याय ५

||ज्ञानेश्वरी भावार्थदीपिका अध्याय ५ || ||ॐ श्री परमात्मने नमः || अध्याय पांचवा | संन्यासयोगः | संन्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि | यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम् ||१|| मग पार्थु श्रीकृष्णातें म्हणे| हां हो हें कैसें तुमचें बोलणें| एक होय

ज्ञानेश्वरी अध्याय ६

||ज्ञानेश्वरी भावार्थदीपिका अध्याय ६ || ||ॐ श्री परमात्मने नमः || अध्याय सहावा | आत्मसंयमयोगः | मग रायातें म्हणे संजयो| तोचि अभिप्रावो अवधारिजो| कृष्ण सांगती आतां जो| योगरूप ||१|| सहजें ब्रह्मरसाचें पारणें| केलें अर्जुनालागीं नारायणें| कीं तेचि अवसरीं पाहुणे| पातलों आम्ही

ज्ञानेश्वरी अध्याय ७

||ज्ञानेश्वरी भावार्थदीपिका अध्याय ७ || ||ॐ श्री परमात्मने नमः || अध्याय सातवा | ज्ञानविज्ञानयोगः | श्रीभगवानुवाच | मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः | असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु ||१|| ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः | यज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ञातव्यमवशिष्यते ||२|| आइका मग

ज्ञानेश्वरी अध्याय८

||ज्ञानेश्वरी भावार्थदीपिका अध्याय ८ || ||ॐ श्री परमात्मने नमः || अध्याय आठवा | अक्षरब्रह्मयोगः | अर्जुन उवाच | किं तद्ब्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम | अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते ||१|| मग अर्जुनें म्हणितलें| हां हो जी अवधारिलें| जें म्यां

ज्ञानेश्वरी अध्याय ९

||ज्ञानेश्वरी भावार्थदीपिका अध्याय ९ || ||ॐ श्री परमात्मने नमः || अध्याय नववा | राजविद्याराजगुह्ययोगः | तरी अवधान एकलें दीजे| मग सर्वसुखासि पात्र होईजे| हें प्रतिज्ञोत्तर माझें| उघड ऐका ||१|| परी प्रौढी न बोलों हो जी| तुम्हां सर्वज्ञांच्या समाजीं| देयावें अवधान

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