श्रीगणेश चालीसा2

चालीसा संग्रह Posted at 2018-11-25 16:47:06
श्रीगणेश चालीसा2 दोहा जय जय जय वंदन भुवन , नंदन गौरिगणेश ।  दुख द्वंद्वन फंदन हरन , सुंदर सुवन महेश ॥ चौपाई जयति शंभु सुत गौरी नंदन । विघ्न हरन नासन भव फंदन ॥ जय गणनायक जनसुख दायक । विश्व विनायक बुद्धि विधायक ॥ एक रदन गज बदन विराजत । वक्रतुंड शुचि शुंड सुसाजत ॥ तिलक त्रिपुण्ड भाल शशि सोहत । छबि लखि सुर नर मुनि मन मोहत ॥ उर मणिमाल सरोरुह लोचन । रत्न मुकुट सिर सोच विमोचन ॥ कर कुठार शुचि सुभग त्रिशूलम् । मोदक भोग सुगंधित फूलम् ॥ सुंदर पीताम्बर तन साजित । चरण पादुका मुनि मन राजित ॥ धनि शिव सुवन भुवन सुख दाता । गौरी ललन षडानन भ्राता ॥ ॠद्धि सिद्धि तव चंवर सुढारहिं । मूषक वाहन सोहित द्वारहिं ॥ तव महिमा को बरनै पारा । जन्म चरित्र विचित्र तुम्हारा ॥ एक असुर शिवरुप बनावै । गौरिहिं छलन हेतु तह आवै ॥ एहि कारण ते श्री शिव प्यारी । निज तन मैल मूर्ति रचि डारि ॥ सो निज सुत करि गृह रखवारे । द्धारपाल सम तेहिं बैठारे ॥ जबहिं स्वयं श्री शिव तहं आए । बिनु पहिचान जान नहिं पाए ॥ पूछ्यो शिव हो किनके लाला । बोलत भे तुम वचन रसाला ॥ मैं हूं गौरी सुत सुनि लीजै । आगे पग न भवन हित दीजै ॥ आवहिं मातु बूझि तब जाओ । बालक से जनि बात बढ़ाओ ॥ चलन चह्यो शिव बचन न मान्यो । तब ह्वै क्रुद्ध युद्ध तुम ठान्यो ॥ तत्क्षण नहिं कछु शंभु बिचारयो । गहि त्रिशूल भूल वश मारयो ॥ शिरिष फूल सम सिर कटि गयउ । छट उड़ि लोप गगन महं भयउ ॥ गयो शंभु जब भवन मंझारी । जहं बैठी गिरिराज कुमारी ॥ पूछे शिव निज मन मुसकाये । कहहु सती सुत कहं ते जाये ॥ खुलिगे भेद कथा सुनि सारी । गिरी विकल गिरिराज दुलारी ॥ कियो न भल स्वामी अब जाओ । लाओ शीष जहां से पाओ ॥ चल्यो विष्णु संग शिव विज्ञानी । मिल्यो न सो हस्तिहिं सिर आनी ॥ धड़ ऊपर स्थित कर दीन्ह्यो । प्राण वायु संचालन कीन्ह्यो ॥ श्री गणेश तब नाम धरायो । विद्या बुद्धि अमर वर पायो ॥ भे प्रभु प्रथम पूज्य सुखदायक । विघ्न विनाशक बुद्धि विधायक ॥ प्रथमहिं नाम लेत तव जोई । जग कहं सकल काज सिध होई ॥ सुमिरहिं तुमहिं मिलहिं सुख नाना । बिनु तव कृपा न कहुं कल्याना ॥ तुम्हरहिं शाप भयो जग अंकित । भादौं चौथ चंद्र अकलंकित ॥ जबहिं परीक्षा शिव तुहिं लीन्हा । प्रदक्षिणा पृथ्वी कहि दीन्हा षड्मुख चल्यो मयूर उड़ाई । बैठि रचे तुम सहज उपाई ॥ राम नाम महि पर लिखि अंका । कीन्ह प्रदक्षिण तजि मन शंका ॥ श्री पितु मातु चरण धरि लीन्ह्यो । ता कहं सात प्रदक्षिण कीन्ह्यो ॥ पृथ्वी परिक्रमा फल पायो । अस लखि सुरन सुमन बरसायो ॥ सुंदरदास राम के चेरा । दुर्वासा आश्रम धरि डेरा ॥ विरच्यो श्रीगणेश चालीसा । शिव पुराण वर्णित योगीशा ॥ नित्य गजानन जो गुण गावत । गृह बसि सुमति परम सुख पावत ॥ जन धन धान्य सुवन सुखदायक । देहिं सकल शुभ श्री गणनायक ॥ दोहा श्री गणेश यह चालिसा , पाठ करै धरि ध्यान ।  नित नव मंगल मोद लहि , मिलै जगत सम्मान ॥ द्धै सहस्त्र दस विक्रमी , भाद्र कृष्ण तिथि गंग ।  पूरन चालीसा भयो , सुंदर भक्ति अभंग ॥ 

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