श्री राम चालीसा

चालीसा संग्रह Posted at 2018-11-19 14:05:17
श्री राम चालीसा श्री रघुवीर भक्त हितकारी । सुन लीजै प्रभु अरज हमारी ॥ निशिदिन ध्यान धरै जो कोई । ता सम भक्त और नहिं होई ॥1॥ ध्यान धरे शिवजी मन माहीं । ब्रह्म इन्द्र पार नहिं पाहीं ॥ दूत तुम्हार वीर हनुमाना । जासु प्रभाव तिहूं पुर जाना ॥2॥ तब भुज दण्ड प्रचण्ड कृपाला । रावण मारि सुरन प्रतिपाला ॥ तुम अनाथ के नाथ गुंसाई । दीनन के हो सदा सहाई ॥3॥ ब्रह्मादिक तव पारन पावैं । सदा ईश तुम्हरो यश गावैं ॥ चारिउ वेद भरत हैं साखी । तुम भक्तन की लज्जा राखीं ॥4॥ गुण गाव शारद मन माहीं । सुरपति ताको पार न पाहीं ॥ नाम तुम्हार लेत जो कोई । ता सम धन्य और नहिं होई ॥5॥ राम नाम है अपरम्पारा । चारिहु वेदन जाहि पुकारा ॥ गणपति नाम तुम्हारो लीन्हो । तिनको प्रथम पूज्य तुम कीन्हो ॥6॥ शेष रटत नित नाम तुम्हारा । महि को भार शीश पर धारा ॥ फूल समान रहत सो भारा । पाव न कोऊ तुम्हरो पारा ॥7॥ भरत नाम तुम्हरो उर धारो । तासों कबहुं न रण में हारो ॥ नाम शक्षुहन हृदय प्रकाशा । सुमिरत होत शत्रु कर नाशा ॥8॥ लखन तुम्हारे आज्ञाकारी । सदा करत सन्तन रखवारी ॥ ताते रण जीते नहिं कोई । युद्घ जुरे यमहूं किन होई ॥9॥ महालक्ष्मी धर अवतारा । सब विधि करत पाप को छारा ॥ सीता राम पुनीता गायो । भुवनेश्वरी प्रभाव दिखायो ॥10॥ घट सों प्रकट भई सो आई । जाको देखत चन्द्र लजाई ॥ सो तुमरे नित पांव पलोटत । नवो निद्घि चरणन में लोटत ॥11॥ सिद्घि अठारह मंगलकारी । सो तुम पर जावै बलिहारी ॥ औरहु जो अनेक प्रभुताई । सो सीतापति तुमहिं बनाई ॥12॥ इच्छा ते कोटिन संसारा । रचत न लागत पल की बारा ॥ जो तुम्हे चरणन चित लावै । ताकी मुक्ति अवसि हो जावै ॥13॥ जय जय जय प्रभु ज्योति स्वरूपा । नर्गुण ब्रह्म अखण्ड अनूपा ॥ सत्य सत्य जय सत्यव्रत स्वामी । सत्य सनातन अन्तर्यामी ॥14॥ सत्य भजन तुम्हरो जो गावै । सो निश्चय चारों फल पावै ॥ सत्य शपथ गौरीपति कीन्हीं । तुमने भक्तिहिं सब विधि दीन्हीं ॥15॥ सुनहु राम तुम तात हमारे । तुमहिं भरत कुल पूज्य प्रचारे ॥ तुमहिं देव कुल देव हमारे । तुम गुरु देव प्राण के प्यारे ॥16॥ जो कुछ हो सो तुम ही राजा । जय जय जय प्रभु राखो लाजा ॥ राम आत्मा पोषण हारे । जय जय दशरथ राज दुलारे ॥17॥ ज्ञान हृदय दो ज्ञान स्वरूपा । नमो नमो जय जगपति भूपा ॥ धन्य धन्य तुम धन्य प्रतापा । नाम तुम्हार हरत संतापा ॥18॥ सत्य शुद्घ देवन मुख गाया । बजी दुन्दुभी शंख बजाया ॥ सत्य सत्य तुम सत्य सनातन । तुम ही हो हमरे तन मन धन ॥19॥ याको पाठ करे जो कोई । ज्ञान प्रकट ताके उर होई ॥ आवागमन मिटै तिहि केरा । सत्य वचन माने शिर मेरा ॥20॥ और आस मन में जो होई । मनवांछित फल पावे सोई ॥ तीनहुं काल ध्यान जो ल्यावै । तुलसी दल अरु फूल चढ़ावै ॥21॥ साग पत्र सो भोग लगावै । सो नर सकल सिद्घता पावै ॥ अन्त समय रघुबरपुर जाई । जहां जन्म हरि भक्त कहाई ॥22॥ श्री हरिदास कहै अरु गावै । सो बैकुण्ठ धाम को पावै ॥23॥ ॥ दोहा॥ सात दिवस जो नेम कर, पाठ करे चित लाय । हरिदास हरि कृपा से, अवसि भक्ति को पाय ॥ राम चालीसा जो पढ़े, राम चरण चित लाय । जो इच्छा मन में करै, सकल सिद्घ हो जाय ॥

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